Saturday, 6 December 2008

ऑफिस छूट न जाए (कविता)

घर से ऑफिस जाते समय
रास्ते में
मेरी माँ की शक्ल की
एक ओरत को
बस ने धक्का मारा
मेरे सामने
खून से लथपथ
सहायता के लिए
चीखती, चिल्लाती
चोराहे के बीच
मैं देख कर
अनदेखा करके
आगे बद्द गया
बाइक पर पीछे बैठे
मेरे मित्र ने कहा
हमलोग कितने संवेदनहीन हो गए हैं
मैंने कहा -
कहीं इसके चक्कर में
ऑफिस छूट न जाये
चलो जल्दी चलें ।
-कुबेर नाथ

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